सृष्टि के निर्माणदाता - By Gaurav Paliwal




सृष्टि के निर्माणदाता

शिव तुम्हें प्रणाम है

मैं तुम्हारे मुख से निकला

शिव ही मेरा संवाद है।


भक्ति के समर्पण में

शिव का ही तो वास है

मैं उसी में लीन इतना

हर सांस में शिव का वास है।


काल के भी काल हो तुम

तुमसे ही हर प्राण है

बिन तुम्हारे जगत सारा

ज्यों बिना सुर के गान है।


रुद्र रूप में संहारक

शांत रूप में धाम है

जग के हर कण कण में

बस तुम्हारा ही नाम है।


त्रिनेत्र की ज्वाला में

अज्ञान का विनाश है

डमरू की उस ध्वनि में

जगा सृष्टि का प्रकाश है।


गंगा सी पावन धारा

तेरी जटा का मान है

नंदी की हर एक धड़कन

तेरे चरणों का गान है।


अंतरतम के शून्य में

तेरा ही विस्तार है

शिव तुम ही आधार हो

तुमसे ही यह संसार है।


जब-जब मन डगमगाया

तुमने ही थामा हाथ है

तेरी कृपा से ही चलता

जीवन का हर सार है।


अहं मिटे तो दिखे तुम

सत्य का एहसास है

शिव तुम ही मेरा आदि

तुझमें ही तो अनंत है।


आपकी प्रस्तुत कविता में भगवान शिव के प्रति अखंड श्रद्धा, दार्शनिक गहनता और आध्यात्मिक समर्पण का अत्यंत प्रभावशाली तथा संवेदनशील चित्रण निहित है, जिसमें कवि अपने अस्तित्व की जड़, अपने चेतन–अचेतन का मूल और सम्पूर्ण सृष्टि की गति–प्रकृति का आधार शिव को ही स्वीकार करता है। कविता का आरंभ सृष्टि के निर्माणकर्ता के रूप में शिव को प्रणाम करने से होता है, जो यह संकेत देता है कि कवि की दृष्टि में शिव केवल किसी एक देवता का नाम नहीं, बल्कि समस्त ब्रह्मांड की रचना, संचालन और लय के परम कारण हैं। “मैं तुम्हारे मुख से निकला” जैसे भाव में यह दार्शनिक संकेत निहित है कि जीवात्मा का उद्गम भी उसी परम चेतना से हुआ है, अतः जीव और शिव के बीच कोई भिन्नता नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक संबंध है; कवि का “शिव ही मेरा संवाद है” कहना इस बात का द्योतक है कि उसके लिए वाणी, विचार, अभिव्यक्ति और अंतर्मन की प्रत्येक तरंग शिवमय है। भक्ति के समर्पण में शिव का वास बताकर कवि यह प्रतिपादित करता है कि सच्ची उपासना बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि आत्म-निवेदन और पूर्ण आत्मसमर्पण में निहित है, जहाँ भक्त और भगवान के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है; “हर सांस में शिव का वास” की अनुभूति अद्वैत की उस परंपरा को पुष्ट करती है जिसमें प्रत्येक श्वास-प्रश्वास स्वयं ईश्वर की उपस्थिति का प्रमाण बन जाता है। काल के भी काल के रूप में शिव का वर्णन उन्हें समय से परे, अनादि–अनंत सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जहाँ वे मृत्यु और परिवर्तन के भी अधिपति हैं; यह भाव यह भी स्पष्ट करता है कि जगत की समस्त गति, प्राणों की स्पंदनशीलता और अस्तित्व का संपूर्ण आधार उसी परम सत्ता से संचालित है, और उसके बिना जीवन का स्वर वैसे ही अधूरा है जैसे बिना सुर के कोई गान अर्थहीन हो जाता है। रुद्र रूप में संहारक और शांत रूप में धाम के रूप में शिव का द्वैतस्वरूप यह दर्शाता है कि विनाश और करुणा, उग्रता और शांति—दोनों ही उसी एक परम तत्त्व के विविध आयाम हैं; विनाश यहाँ नकारात्मक नहीं, बल्कि सृजन की पूर्वपीठिका है, क्योंकि संहार के पश्चात ही नूतन सृजन संभव होता है। जग के कण-कण में शिव का नाम व्याप्त होने की अनुभूति सर्वव्यापकता का उद्घोष है, जहाँ ईश्वर किसी सीमित मंदिर या प्रतिमा तक सीमित न होकर प्रत्येक अणु, प्रत्येक चेतना और प्रत्येक प्रकृति-तत्व में समाहित है। त्रिनेत्र की ज्वाला में अज्ञान के विनाश का संकेत यह दर्शाता है कि शिव का तीसरा नेत्र केवल प्रलय का प्रतीक नहीं, बल्कि अविद्या के अंत और आत्मज्ञान के उदय का प्रतीक है; जब यह ज्ञानाग्नि प्रकट होती है तो मिथ्या, भ्रम और अंधकार स्वतः समाप्त हो जाते हैं। डमरू की ध्वनि में सृष्टि के प्रकाश के जागरण का भाव यह इंगित करता है कि सृष्टि की लय, ताल और स्पंदन स्वयं शिव की चेतना से उत्पन्न हैं; ध्वनि यहाँ नाद-ब्रह्म का प्रतीक बनकर सम्पूर्ण ब्रह्मांड की आद्य-ऊर्जा को व्यक्त करती है। गंगा की पावन धारा को शिव की जटा का मान बताकर कवि यह दर्शाता है कि पवित्रता, करुणा और जीवनदायिनी शक्ति भी उसी दिव्य सत्ता के संरक्षण में है; यह संकेत गंगा की पवित्रता और उसके आध्यात्मिक महत्व को शिव से अभिन्न रूप में जोड़ता है। नंदी की प्रत्येक धड़कन को शिव चरणों का गान कहना भक्ति की उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ सेवक का प्रत्येक कर्म और प्रत्येक स्पंदन अपने आराध्य को समर्पित हो जाता है। अंतरतम के शून्य में शिव के विस्तार का भाव अत्यंत दार्शनिक है, क्योंकि शून्य यहाँ रिक्तता नहीं, बल्कि अनंत संभावनाओं का क्षेत्र है; उसी शून्य में परम चेतना का विस्तार है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बाह्य जगत से अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक चेतना का विस्तार है। “शिव तुम ही आधार हो” की अनुभूति जीवन के प्रत्येक पक्ष—भौतिक, मानसिक, आध्यात्मिक—को एक ही केंद्रीय सत्य से जोड़ देती है; संसार की समस्त विविधता उसी एक आधार पर टिकी हुई है। जब-जब मन डगमगाता है, तब शिव का हाथ थाम लेना यह दर्शाता है कि संकट, संशय और दुख की घड़ियों में आध्यात्मिक आस्था ही मनुष्य को संतुलन प्रदान करती है; शिव की कृपा से जीवन का सार चलता है, यह विश्वास मनुष्य को निराशा से उबारकर आशा की ओर अग्रसर करता है। अहं के मिटने पर शिव के दर्शन की अनुभूति अद्वैत वेदांत की उस मूल शिक्षा को प्रतिध्वनित करती है जिसमें अहंकार ही जीव और ब्रह्म के बीच का आवरण है; जब यह आवरण हटता है, तब सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव संभव होता है। शिव को आदि और अनंत मानकर कवि यह स्वीकार करता है कि समस्त आरंभ और अंत उसी में विलीन हैं; वह ही कारण है, वह ही परिणाम है, और वही समस्त अस्तित्व का चिरंतन आधार है। इस प्रकार पूरी कविता में शिव केवल एक देवस्वरूप नहीं, बल्कि सृष्टि के मूल तत्त्व, चेतना के केंद्र, ज्ञान के प्रकाश, विनाश और सृजन के संतुलन, भक्ति के आश्रय और आत्मबोध के परम लक्ष्य के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं; कवि की वाणी में जो समर्पण, जो दार्शनिक गहराई और जो भावात्मक एकाग्रता प्रकट होती है, वह यह स्पष्ट करती है कि उसके लिए शिव बाहरी आराध्य से कहीं अधिक, उसके स्वयं के अस्तित्व का आंतरिक सत्य हैं, जिनमें से वह उत्पन्न हुआ है और जिनमें ही अंततः विलीन होना उसका परम लक्ष्य है।